# तुमहिं तजि नहिं चहिये गोलोक।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0063-M03-K054
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 54
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 31–32

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>तुमहिं तजि नहिं चहिये गोलोक।  
<a id="line-2"></a>अस ससुरारि पियारि लगति केहि, पिय न होय जेहि ओक।  
<a id="line-3"></a>अस न चहौं तव मधुर मिलन रस, जहँ न विरह-रस शोक।  
<a id="line-4"></a>तजि रस द्वैत न चह सुख निर्गुण, रस अद्वैत अशोक।  
<a id="line-5"></a>तजि तव रूपहिं नहिं चह भूलेहुँ, ब्रह्मानंदालोक।  
<a id="line-6"></a>अस “कृपालु” रस को चह पुनि जहँ, विधि निषेध को रोक॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक तत्त्वज्ञ रसिक कहता है-हे श्यामसुन्दर। तुमको छोड़ कर मैं तुम्हारा गोलोक भी नहीं चाहता। संसार में किसी भी प्रेयसी को ऐसी ससुराल प्यारी नहीं लगती, जिस ससुराल के घर में उसका प्रियतम न हो। मैं ऐसा नित्य-मधुर-मिलन का भी रस नहीं चाहता जिसमें विरह-रस का मिश्रण न हो। मैं सेवक-सेव्य- भावयुक्त द्वैत प्रेम-रस से रहित एकत्व ब्रह्मानन्द रस को भी नहीं चाहता। मैं तुम्हारी रूप-माधुरी को छोड़कर तुम्हारे प्रकाश-मात्र के ब्रह्मानन्द को भी नहीं चाहता। 'कृपालु के शब्दों में पुनः ऐसे रस को कैसे चाहूँगा, जो स्वर्गादि लोक सम्बन्धी है, जहाँ विधि निषेध की भयंकर व्याधि है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 102-103

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
