# तू मन! मनमानी त्याग रे।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0064-M03-K055
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 55
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 32–32

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>तू मन! मनमानी त्याग रे।  
<a id="line-2"></a>बीते जनम अनंत नींद महँ, अब झटपट उठ जाग रे।  
<a id="line-3"></a>पुत्र कलत्र मित्र आदिक जे, तिन करु द्वेष न राग रे।  
<a id="line-4"></a>नँदनंदन पादारविंद ते, करि ले अब अनुराग रे।  
<a id="line-5"></a>तजि दे इंद्रिन विषय वासना, प्रेम सरस रस पाग रे।  
<a id="line-6"></a>जो “कृपालु” चह भुक्ति मुक्ति तो, लगे प्रेम पट दाग रे॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे मन! अब तू अपनी मनमानी छोड़ दे। तुझे अज्ञान को नींद में सोते हुए अनन्त जन्म हो गये। अब जागकर तुरन्त उठ बैठ। पुत्र, स्त्री, मित्र आदि से न तो शुत्रता कर, न तो मित्रता ही कर। श्यामसुन्दर के युगल चरणों में निरन्तर प्रेम कर। इन्द्रियों की विषय वासनाओं को छोड़ दे एवं सरस प्रेम रस में अनुरक्त हो जा। 'कृपालु' कहते हैं, किन्तु ध्यान रहे कि भुक्ति एवं मुक्ति की कामना न उत्पन्न होने पाये, अन्यथा प्रेम के उज्ज्वल वस्त्र पर कलंक लग जायगा।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 103

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
