सिद्धान्त-माधुरी · पद 56
तोरि दिय तृण सम जग को नात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: tori diya tṛiṇa sama jaga ko nāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1तोरि दिय तृण सम जग को नात।
2रसिकन दीन बताय तिहारो, प्रियतम श्यामल गात।
3अब नहिं भावत जगत मायका, दैहिक पति पितु मात।
4सोइ ससुरारि पियारि लगति अब, सोइ चरचाहिं सुहात।
5कब मिलिहैं मम जीवनधन पिय, इहै सोच दिन रात।
6तेहि “कृपालु” पिय मिलत तुरत जेहि, यह रहस्य पतियात॥
हिन्दी भावार्थ
अरी सखि! मैंने संसार के समस्त प्रेम सम्बन्धों को तृण के समान तोड़ कर फेंक दिया। मुझे रसिकों ने कृपा कर यह बता दिया है कि तू देह नहीं है श्यामसुन्दर का अंश जीवात्मा है। तेरे प्रियतम, एवं सर्वस्व श्यामसुन्दर ही हैं! अब मुझे देह सम्बन्धी माता, पिता, पति आदि मिथ्या प्रियजन विवाहिता स्त्री के मायके की भाँति स्वप्न में भी अच्छे नहीं लगते। (मायके की वस्तुओं में तो थोड़ी सी आसक्ति रहती भी है, क्योंकि उससे कभी-कभी दैहिक-स्वार्थ सिद्ध हो जाता है किन्तु आत्मा सम्बन्धी परमानन्द का विषय तो ब्रह्मलोक पर्यन्त के जगत् में लवलेश मात्र भी हल नहीं हो सकता) अब तो प्रियतम श्यामसुन्दर सम्बन्धी ससुराल ही अच्छी लगती है एवं उन्हीं के नाम, गुण, लीला, धाम एवं जनों की चर्चा सुहाती है। दिन-रात यही चिन्ता बनी रहती है कि मेरे प्राणवल्लभ कब मिलेंगे? 'कृपालु' कहते हैं जिस क्षण उपर्युक्त बात पर जीवात्मा का पूर्ण विश्वास हो जाता है। उसी क्षण प्रियतम श्यामसुन्दर मूर्तिमान होकर उसे मिल जते हैं। साधनादि को अपेक्षा नहीं होती, साधना तो उपर्युक्त विश्वास को दृढ़ करने मात्र की ही होती है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 104