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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 57

देहु हरि! यह झगड़ो निपटाय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dehu hari! yaha jhagad̤o nipaṭāya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1देहु हरि! यह झगड़ो निपटाय।

2अति ही प्रबल तिहारी दासी, माया शक्ति कहाय।

3लख चौरासी योनि नचावति, मोहिं जानि असहाय।

4सुतहिं मार दासी पितु देखत, यह जगहूँ न सुनाय।

5पुनि तुम कहँ बिनु हेतु सनेही, वेद पुरानन गाय।

6बरजि “कृपालु” आपुनी माया, देहु प्रेम रस प्याय॥

हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! यह झगड़ा समाप्त कर दीजिये। यह तुम्हारी दासी, शक्ति, माया अत्यन्त ही प्रबल है। मुझे असहाय समझ कर चौरासी लाख योनियं में भटका रही है। बड़े आश्चर्य की बात है कि जीव पुत्र को तुम्हारी माया दासी मारे और तुम पिता होकर देखो। ऐसा तो संसारी, स्वाथी पिता भी नहीं करता फिर तुम्हें तो वेद पुराण बिना कारण के ही कृपा करने वाला बताते हैं। कृपालु कहते हैं कि हे दयामय! अपनी माया को रोक लो तथा मुझे प्रेम-रस पिला कर निहाल कर दो।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 105