लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 58

धन्य सोइ जोइ स्वारथ पहिचान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dhanya soi, joi swāratha pahichāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1धन्य सोइ जोइ स्वारथ पहिचान।

2स्व शब्दार्थ"आत्मा"जानिय, अर्थ अर्थ सब जान।

3परमात्मा को अंश आत्मा, वेद पुरान बखान।

4आत्महिं अर्थ-सिद्धि परमात्महिं, इहै ज्ञान को ज्ञान।

5परमात्मा रस-रूप वेद कह, सोइ रस स्वारथ मान।

6सोइ स्वारथरत जोइ “कृपालु” रत, चरनन श्याम सुजान॥

हिन्दी भावार्थ

संसार में वही भूरि-भाग्यशाली है जो स्वार्थ को पहिचान ले।'स्व'शब्द का अर्थ है 'आत्मा'एवं 'अर्थ'शब्द का मतलब है 'लक्ष्य'। इस प्रकार 'स्वार्थ'शब्द का अर्थ हुआ आत्मा के लक्ष्य की प्राप्ति।'आत्मा 'वेद-पुराणादि द्वारा प्रमाणित परमात्मा का अंश है। अतएव आत्मा की लक्ष्यप्राप्ति परमात्मा के द्वारा ही संभव है। बस, यही जानने योग्य ज्ञान है। वेदादिकों के द्वारा यह निर्विवाद सिद्ध है कि परमात्मा 'रसस्वरूप'है अतएव वही दिव्य रस-रूपी लक्ष्य प्राप्ति ही सच्चा स्वार्थ है। कृपालु' कहते हैं कि मोटी अक्ल वाले इतना ही समझ लें कि वही सच्चा स्वार्थी है जो श्यामसुन्दर के चरण कमलों में निष्काम भाव से प्रेम करता है। शेष स्वार्थ दैहिक होने के कारण नश्वर हैं, अतएव उनसे आअत्यन्तिक-दुःख-निवृत्ति अथवा आअत्यन्तिक -सुख-प्राप्ति रूपी परम चरम लक्ष्य अनन्त काल में भी नहीं प्राप्त हो सकता।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 105-106