# धन्य सोइ जोइ स्वारथ पहिचान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0067-M03-K058
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 58
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 33–33

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>धन्य सोइ जोइ स्वारथ पहिचान।  
<a id="line-2"></a>स्व शब्दार्थ"आत्मा"जानिय, अर्थ अर्थ सब जान।  
<a id="line-3"></a>परमात्मा को अंश आत्मा, वेद पुरान बखान।  
<a id="line-4"></a>आत्महिं अर्थ-सिद्धि परमात्महिं, इहै ज्ञान को ज्ञान।  
<a id="line-5"></a>परमात्मा रस-रूप वेद कह, सोइ रस स्वारथ मान।  
<a id="line-6"></a>सोइ स्वारथरत जोइ “कृपालु” रत, चरनन श्याम सुजान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

संसार में वही भूरि-भाग्यशाली है जो स्वार्थ को पहिचान ले।'स्व'शब्द का अर्थ है 'आत्मा'एवं 'अर्थ'शब्द का मतलब है 'लक्ष्य'। इस प्रकार 'स्वार्थ'शब्द का अर्थ हुआ आत्मा के लक्ष्य की प्राप्ति।'आत्मा 'वेद-पुराणादि द्वारा प्रमाणित परमात्मा का अंश है। अतएव आत्मा की लक्ष्यप्राप्ति परमात्मा के द्वारा ही संभव है। बस, यही जानने योग्य ज्ञान है। वेदादिकों के द्वारा यह निर्विवाद सिद्ध है कि परमात्मा 'रसस्वरूप'है अतएव वही दिव्य रस-रूपी लक्ष्य प्राप्ति ही सच्चा स्वार्थ है। कृपालु' कहते हैं कि मोटी अक्ल वाले इतना ही समझ लें कि वही सच्चा स्वार्थी है जो श्यामसुन्दर के चरण कमलों में निष्काम भाव से प्रेम करता है। शेष स्वार्थ दैहिक होने के कारण नश्वर हैं, अतएव उनसे आअत्यन्तिक-दुःख-निवृत्ति अथवा आअत्यन्तिक -सुख-प्राप्ति रूपी परम चरम लक्ष्य अनन्त काल में भी नहीं प्राप्त हो सकता।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 105-106

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
