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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 59

धरो मन! गौर-चरन को ध्यान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dharo mana! gaura-charana ko dhyāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1धरो मन! गौर-चरन को ध्यान।

2जिन चरनन को राखत निज उर, सुंदर श्याम सुजान।

3भटकत कोटि कल्प तोहिं बीते, खायो सिर पदत्रान।

4चार प्रकार लक्ष चौरासी, द्वार फिर्यो जनु स्वान।

5चरण-शरण कबहूँ नहिं आयो, अबहूँ करत न कान।

6येहि दरबार दीन को आदर, पतितन को सनमान।

7पुनि “कृपालु” तुम कत चूकत मन, पंडित बनत महान॥

हिन्दी भावार्थ

अरे मन! कीर्ति-कुँवरि राधिका जी के चरणों का निरन्तर ध्यान किया कर, जिन चरणों का ध्यान सच्चिदानन्द श्रीकृष्ण भी करते हैं। अरे मन! तुझे भटकते हुए अनन्त जन्म बीत चुके, एवं तूने उन विषयों के अनंत बार जूते खाये। स्वेदज, अंडज, उद्भिज, जरायुज इन चार प्रकार की उत्पत्ति के द्वारा कुत्ते की तरह तूने चौरासी लाख योनियों में चक्कर लगाया है, किन्तु किशोरी जी के चरण-कमलों की शरण कभी नहीं ली। आज भी मेरी बात नहीं मान रहा है। अरे मन! किशोरी जी के दरबार में पतितों एवं दीनों को ही सम्मान मिलता है। 'कृपालु' कहते हैं कि अरे मन! तुम बहुत बड़े पंडित बनते हो। फिर ऐसा अवसर क्यों खो रहे हो, अर्थात् किशोरी जी के चरणों की शरण क्यों नहीं लेते?

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 106-107