सिद्धान्त-माधुरी · पद 60
नाथ! मम तुम ही सोँ सब नात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: nātha! mama tumahī soṁ saba nāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1नाथ! मम तुम ही सोँ सब नात।
2सुत दंपति पितु मातु नात कहँ, अब लौं रह पतियात।
3अब जान्यों यह नात तबहिं लौं, जब लौं रह यह गात।
4हौं नहिं गात गात है हमरो, यह जड़-मतिहुँ सुनात।
5पुनि मम गात-नात भल कैसे, ह्वै मम नात सकात?।
6मायिक गात-विषय मायिक जग, सब अनुभवहिं लखात।
7हौं हौं अंश सनातन हरि को, वेद विदित विख्यात।
8जान्यों अब “कृपालु” बस हमरो, सबरो इक बलभ्रात॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! मेरा नाता एकमात्र तुम ही से है। सत्री, पति, पिता, माता, पुत्र आदि नातेदारों पर अब तक विश्वास करते थे, अब यह जान.गया हूँ कि यह सब नाते तो तभी तक के हैं जब तक यह पंचमहाभूत का शरीर है। ''मैं शरीर नहीं हूँ! "यह मेरा शरीर है''यह घोर मूर्ख भी बोलता है। फिर मैरे शरीर का नाता, मेरा नाता कैसे हो सकता है। माया से उत्पन्न शरीर का विषय मायिक संसार के पदार्थ हैं। यह सबके अनुभव से सिद्ध है। "मैं तो ईश्वर का सनातन अंश हूँ"ऐसा वेदादिकों ने निरूपित किया है। 'कृपालु' कहते हैं-बस, अब हमने जान लिया कि हमारे सर्वस्व एकमात्र श्यामसुन्दर ही हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 107-108