सिद्धान्त-माधुरी · पद 61
नाथ सब अहइ तिहारेइ हाथ।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: nātha! saba ahai tihārei hātha
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1नाथ सब अहइ तिहारेइ हाथ।
2काम क्रोध मद लोभ मोह मोहिं, बहुत सतायो नाथ।
3इंद्रिय-मन-बुधि सबै देत नित, माया को ही साथ।
4तव माया अति प्रबल नचावति, मो कहँ जानि अनाथ।
5जब लौं धरहु न हाथ आपनो, नाथ हमारे माथ।
6तब लौं हौं “कृपालु” नहिं ह्वै हौं, दीनानाथ! सनाथ॥
हिन्दी भावार्थ
हे नाथ! सब कुछ ही तुम्हारे हाथ है। काम, क्रोध मद, लोभ, मोह आदि शत्रुओं ने मेरा पीछा कर लिया है। इन्द्रिय, मन, बुद्धि, आदि सभी माया का ही साथ देते हैं। यह तुम्हारी प्रबल माया मुझको अनाथ समझ कर चौरासी लाख योनियों में भटका रही है। हे नाथ! जब तक तुम अपना हाथ मेरे मस्तक पर नहीं रख देते, "कृपालु कहते हैं तब तक हम किसी भी प्रकार सनाथ नहीं हो सकते।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 108