सिद्धान्त-माधुरी · पद 62
पड़ो सखि! नेम प्रेम झगड़ो।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: pad̤o sakhi! nema prema jhagad̤o
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1पड़ो सखि! नेम प्रेम झगड़ो।
2जा दिन लख्यों नैन मनमोहन, कुंज लतान ठड़ो।
3ता दिन ते इन मन बुधि महँ इक, झगड़ो आन पड़ो।
4मन कह प्रेमहिं बड़ो, बुद्धि कह, नेमहिं होत बड़ो।
5मन कह छाँड़ु वेद मर्यादहिं, बुधि कह, तिन पकड़ो।
6प्रेमहिं नेम “कृपालु” , न नेमहिं, प्रेम बड़ो न लड़ो॥
हिन्दी भावार्थ
अरी सखि! नियम एवं प्रेम में एक झगड़ा आ खड़ा हुआ है। जिस दिन से आँखों ने लता-कुंज में खड़े हुए निकुंज बिहारी श्री श्यामसुन्दर को देखा है, उस दिन से मेरे मन एवं बुद्धि में झगड़ा चल रहा है। मन कहता है प्रेम ही बड़ा होता है किन्तु बुद्धि कहती है नियम ही बड़ा होता है। मन कहता है वेद की मर्यादा सम्बन्धी विधि-निषेधात्मक धर्म-कर्म छोड़ दो, एक-मात्र श्यामसुन्दर से ही प्रेम करो। बुद्धि कहती है-नहीं नहीं, वेद भी तो ईश्वरीय वाकय ही है, अतएव उसको छोड़ना ईश्वर का अपमान है। 'कृपालु'निर्णय देते हैं कि वेद का लक्ष्य यही तो है कि जीव का मन ईश्वर में अनुरक्त हो। अतएव श्यामसुन्दर-सम्बन्धी-प्रेम का नियम ही श्रेष्ठ है। केवल नियम से ही प्रेम करना श्यामसुन्दर के प्रेम से रहित होने के कारण त्याज्य है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 109