# पड़ो सखि! नेम प्रेम झगड़ो।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0071-M03-K062
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 62
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 35–35

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>पड़ो सखि! नेम प्रेम झगड़ो।  
<a id="line-2"></a>जा दिन लख्यों नैन मनमोहन, कुंज लतान ठड़ो।  
<a id="line-3"></a>ता दिन ते इन मन बुधि महँ इक, झगड़ो आन पड़ो।  
<a id="line-4"></a>मन कह प्रेमहिं बड़ो, बुद्धि कह, नेमहिं होत बड़ो।  
<a id="line-5"></a>मन कह छाँड़ु वेद मर्यादहिं, बुधि कह, तिन पकड़ो।  
<a id="line-6"></a>प्रेमहिं नेम “कृपालु” , न नेमहिं, प्रेम बड़ो न लड़ो॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

अरी सखि! नियम एवं प्रेम में एक झगड़ा आ खड़ा हुआ है। जिस दिन से आँखों ने लता-कुंज में खड़े हुए निकुंज बिहारी श्री श्यामसुन्दर को देखा है, उस दिन से मेरे मन एवं बुद्धि में झगड़ा चल रहा है। मन कहता है प्रेम ही बड़ा होता है किन्तु बुद्धि कहती है नियम ही बड़ा होता है। मन कहता है वेद की मर्यादा सम्बन्धी विधि-निषेधात्मक धर्म-कर्म छोड़ दो, एक-मात्र श्यामसुन्दर से ही प्रेम करो। बुद्धि कहती है-नहीं नहीं, वेद भी तो ईश्वरीय वाकय ही है, अतएव उसको छोड़ना ईश्वर का अपमान है। 'कृपालु'निर्णय देते हैं कि वेद का लक्ष्य यही तो है कि जीव का मन ईश्वर में अनुरक्त हो। अतएव श्यामसुन्दर-सम्बन्धी-प्रेम का नियम ही श्रेष्ठ है। केवल नियम से ही प्रेम करना श्यामसुन्दर के प्रेम से रहित होने के कारण त्याज्य है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 109

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
