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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 63

पिय मोल अमोलक लीजिये।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: piya mola amolaka lījiye

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1पिय मोल अमोलक लीजिये।

2अस अवसर फिर नाहिं मिलैगो, बातन मोर पतीजिये।

3बनन चहत जो अमर-सुहागिनी, तन-मन-प्रानन दीजिये।

4दै सरबस लै प्रेम-सुधा-रस, तेहि रस महँ नित भीजिये।

5पुनि तेहि रसहिं पिवाइय औरहिं, आपुहुँ सोइ रस पीजिये।

6जनम “कृपालु” सफल कर लीजिय, क्यों कर? निज कर मीजिये॥

हिन्दी भावार्थ

अरी सखि! अनमोल श्यामसुन्दर को मोल ले ले। मानव-देह प्राप्ति-रूपी ऐसा स्वर्ण अवसर फिर नहीं मिलेगा। मेरी बात पर विश्वास कर ले। यदि तू अनन्त-काल के लिए अमर सुहागिन बनना चाहती है, तो उन्हीं श्यामसुन्दर को सदा के लिए अपना सर्वस्व दे दे। प्राकृत, तन, मन आदि देकर अनन्त काल के लिए दिव्य प्रेमानन्द का आस्वादन कर। फिर उसी प्रेमानन्द को स्वयं पीते हुए औरों को भी पिलाती जा। कृपालु' कहते हैं कि उपर्युक्त बात मान कर अपना जन्म सफल कर ले अन्यथा पछताना पड़ेगा।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 109-110