# पिय मोल अमोलक लीजिये।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0072-M03-K063
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 63
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 35–35

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>पिय मोल अमोलक लीजिये।  
<a id="line-2"></a>अस अवसर फिर नाहिं मिलैगो, बातन मोर पतीजिये।  
<a id="line-3"></a>बनन चहत जो अमर-सुहागिनी, तन-मन-प्रानन दीजिये।  
<a id="line-4"></a>दै सरबस लै प्रेम-सुधा-रस, तेहि रस महँ नित भीजिये।  
<a id="line-5"></a>पुनि तेहि रसहिं पिवाइय औरहिं, आपुहुँ सोइ रस पीजिये।  
<a id="line-6"></a>जनम “कृपालु” सफल कर लीजिय, क्यों कर? निज कर मीजिये॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

अरी सखि! अनमोल श्यामसुन्दर को मोल ले ले। मानव-देह प्राप्ति-रूपी ऐसा स्वर्ण अवसर फिर नहीं मिलेगा। मेरी बात पर विश्वास कर ले। यदि तू अनन्त-काल के लिए अमर सुहागिन बनना चाहती है, तो उन्हीं श्यामसुन्दर को सदा के लिए अपना सर्वस्व दे दे। प्राकृत, तन, मन आदि देकर अनन्त काल के लिए दिव्य प्रेमानन्द का आस्वादन कर। फिर उसी प्रेमानन्द को स्वयं पीते हुए औरों को भी पिलाती जा। कृपालु' कहते हैं कि उपर्युक्त बात मान कर अपना जन्म सफल कर ले अन्यथा पछताना पड़ेगा।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 109-110

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
