सिद्धान्त-माधुरी · पद 64
प्राणधन जीवन कुंज बिहारी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: prāṇadhana jīvana kuñja bihārī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1प्राणधन जीवन कुंज बिहारी।
2तुम तो रहे सनातन हमरे, हौं हूँ रही तिहारी।
3उर लगाय भुज भरि हरि चाहे, पुरवहु आस हमारी।
4चाहे मोहिं तड़पाउ मोरि मुख, पग ठुकराव मुरारी।
5जेहि विधि पिवु सुख पाउ करिय सोइ, मो कहँ सोइ सुख भारी।
6यह “कृपालु” है रीति प्रीति की, निज सुख चह व्यापारी॥
हिन्दी भावार्थ
हे प्राणेश्वर! कुंजनिहारी श्रीकृष्ण! तुम ही मेरे जीवन सर्वस्व हो। हमारा-तुम्हारा यह सम्बन्ध सदा से है एवं सदा रहेगा (अज्ञानतावश मैं इस सम्बन्ध को भूल गयी)। तुम चाहे मेरा आलिंगन करके मुझे अपने गले से लगाते हुए, मेरी तड़पाते रहो, चाहे पैरों से ठोकर मार-मारकर मेरा सर्वथा परित्याग कर दो। प्राणेश्वर! तुम्हें जिस-जिस प्रकार से भी सुख मिले, वही करो मैं तुम्हारी हर इच्छा में प्रसन्न रहूँगी। कृपालु' कहते हैं कि निष्काम प्रेम का स्वरूप ही यही है कि अपनी इच्छाओं को न रखते हुए, प्रियतम की प्रसन्नता में ही प्रसन्न रहा जाय। अपने स्वार्थ के लिए प्रियतम से बदला पाने की भावना से प्रेम करना व्यवहार जगत का नाटकीय व्यापार सा ही है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 110-111