सिद्धान्त-माधुरी · पद 65
प्रीति की रीति न सखि सब जान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: prīti kī rīti na sakhi saba jāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1प्रीति की रीति न सखि सब जान।
2जो मन रह रत सुत वनितनि पति, सो न सकत पहिचान।
3पुनि जो मन रह रत श्रुति कर्मन, सोउ मन जान अयान।
4पुनि सोउ मन नहिं जानि सकत जो, निरत मुक्ति हित ज्ञान।
5जो मन लोकन वेदन मुक्ति न, ह्वै विरक्त भज कान्ह।
6सोइ “कृपालु” तिन अनुकंपा ते, प्रीति-रीति उर आन॥
हिन्दी भावार्थ
अरी सखि! प्रीति की रीति को बिरले ही जानते हैं। जो मन स्त्री, पुत्र, पति आदि में आसक्त रहता है वह नहीं समझ सकता, जो मन वेद-विहित कर्म धर्म में आसक्त रहता है वह भी नहीं समझ सकता। और वह भी नहीं समझ सकता जो अद्वैत-ज्ञान के द्वारा मुक्ति में आसक्त है। जो मन लोक-वेद एवं मुक्ति आदि से विरक्त होकर श्यामसुन्दर में आसक्त होता है, 'कृपालु' कहते हैं, वही मन श्यामसुन्दर की अनुकम्पा से प्रीति की रीति को जान सकता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 111