सिद्धान्त-माधुरी · पद 66
प्रीति सखि काको कहत बताय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: prīti sakhi, kāko kahata batāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1प्रीति सखि काको कहत बताय।
2सखि कह कत पूछति? का कतहूँ, चाहति प्रीति लगाय।
3हौं कबहुँ सखि प्रीति कियो नहिं, जान न वाय बलाय।
4पै हौं कालि लखी मनमोहन, सो मन गयो समाय।
5अब मोहिं इक पल कल न परत कहुँ, पल पल कलप लखाय।
6कह “कृपालु” सखि प्रीति करी नहिं, पै ह्वै गइ बलभाय॥
हिन्दी भावार्थ
अरी सखि! जरा यह तो बता प्रेम किसे कहते हैं''? सखी पूछती है, ''अरी सखि! क्या कहीं प्रेम करना चाहती है''? सखी ने उत्तर दिया-''अरी सखि! वैसे तो मैंने कभी प्रेम नहीं किया, प्रेम क्या बलाय है यह भी नहीं समझती थी, किन्तु कल ही अचानक श्यामसुन्दर को देखा, और देखते ही वे मन में समा गये। अब मुझे उनके बिना एक-एक क्षण कल्प के समान भारी लगता है'''कृपालु' कहते हैं अरी सखि! तूने प्रेम किया नहीं, अपितु अपने आप हो गया। जिसे शास्त्रों में रागात्मिका भक्ति कहते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 112