सिद्धान्त-माधुरी · पद 67
काम प्रेम ना, प्रेम काम ना।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kāma prema nā, prema kāma nā
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1काम प्रेम ना, प्रेम काम ना।
2कामहिं, प्रेमहिं-नाम रहत ना, प्रेमहिं, कामहिं-नाम ना।
3काम तिमिर, अरु प्रेम तिमिर हर, दोउ रहि सक इक ठाम ना।
4प्रेम होत प्रेमास्पद-सुख-हित, काम धरत तहँ पाम ना।
5कामहिं इक निज सुखहिं कामना, श्यामहिं-सुख कछु काम ना।
6कह “कृपालु” कहुँ काम प्रेम कहँ, हो न आमना सामना॥
हिन्दी भावार्थ
कामना प्रेम नहीं हो सकती, एवं प्रेम कामना नहीं हो सकता। कामना में नाममात्र को भी प्रेम नहीं रहता, एवं प्रेम में नाममात्र को भी कामना नहीं रहती। कामना अन्धकार के समान है एवं प्रेम सूर्य के प्रकाश के समान है, अतएव दोनों एक स्थान पर त्रिकाल में भी नहीं रह सकते। प्रेम में एक प्रेमास्पद के सुख का ही लक्ष्य होता है, अपने सुख की कामना का लक्ष्य लवलेश मात्र भी नहीं होता। किन्तु कामना में एकमात्र अपने सुख की ही इच्छा रहती है, प्रेमास्पद के सुख को कामना की गन्ध भी नहीं रहती 'कृपालु' कहते हैं कि निर्विवाद सिद्धान्त यह है कि प्रेम एवं कामना विरोधी होने के कारण उन दोनों का एक स्थान पर आमना-सामना ही नहीं हो सकता। भावार्थ यह है कि यदि किसी को प्रेम प्राप्त करना है तो मोक्ष पर्यन्त की कामनाओं का सर्वथा परित्याग करना होगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 112-113