सिद्धान्त-माधुरी · पद 68
ब्रह्म तुम केहि बल पर इतरात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: brahma! tuma kehi bala para itarāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ब्रह्म तुम केहि बल पर इतरात।
2जो होवे अपराध क्षमा तो, सुनिय कहौं कछु बात।
3तुम गुनहीन निगम भाखत हम, सगुन विश्व विख्यात।
4तुम निष्क्रिय मन बुद्धि रहित हम, इन सों युक्त लखात।
5हम अनेक तुम एक अतनु पुनि, तुम कछु करि न सकात।
6हम नामी धामी पै तुम्हरो, नाम न धाम सुनात।
7जो तुम कहो सगुण सक्रिय हौं, तो पुनि हमरिहिं भाँत।
8जैसे हम तैसे ही तुम हो, अंतर कछु न जनात।
9हम सदोष परदोष सदा सों, खोजत, तुम घबरात।
10कलियुग बहुमत पुनि हम पंडित, पुनि बहु मद मदमात।
11तासोँ ब्रह्म? “कृपालु” कह्यो जो, बुरो न मान्यो भ्रात॥
हिन्दी भावार्थ
हे भगवान्! तुम किस बात पर इतरा रहे हो। यदि अपराध क्षमा हो तो मैं कुछ बात कहूँ। सुनिये, तुम्हें वेद गुणहीन (निर्गुण) कहता है, किन्तु हम तो समस्त विश्व में सभी गुणों से युक्त (सगुण) प्रसिद्ध हैं। तुम मन-बुद्धि से रहित हो तथा कुछ काम भी नहीं कर सकते (निष्क्रिय हो) किन्तु हम मन-बुद्धि से युक्त तथा सब कुछ कर सकते हैं। तुम एक हो, फिर साथ ही निराकार भी हो, किन्तु हम अनन्त हैं तथा साकार भी हैं। हमारा नाम एवं स्थान भी है, किन्तु तुम इन दोनों से रहित हो। अगर तुम यह कहो कि मेरा भी दूसरा स्वरूप सगुण एवं क्रियात्मक है, तब तो तुम हमारे ही समान हुए, कोई अन्तर नहीं हुआ। हम सदोष हैं इसलिए सदा से सबमें दोष देखते हैं, लेकिन तुम घबराते हो। एक तो कलियुग फिर हम अनंत-जीव एक पक्षवाले, फिर हम पंडित, तथा तिस पर भी अनेक मदों से युक्त हैं। हे भाई ब्रह्म! "कृपालु कहते हैं कि मैंने जो कुछ भी कहा है उसका बुरा न मानना।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 113-114