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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 69

भजो मन! निशि दिन नंदकुमार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bhajo mana! nishi dina nandakumāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1भजो मन! निशि दिन नंदकुमार।

2सकल जगत महँ सोइ एक है, साँचो मीत तिहार।

3जे जग मीत मान दंपति सुत, तिन स्वारथ को प्यार।

4लिय द्वै मूठि सुदामहिं तंदुल, दिय द्वै लोक, विचार।

5कूबरि को सुंदरि करि लखु किय, कमला सोँ व्यवहार।

6कह “कृपालु” कत चूकत नर तनु, मिलत न बारम्बार॥

हिन्दी भावार्थ

अरे मन! श्यामसुन्दर का निरंतर भजन कर। अनंत कोटि ब्रह्मांड में तेरा सच्चा मित्र एक-मात्र वही है। संसार के जिन स्त्री, पति, पुत्र, मित्रादि को तू अपना मित्र समझता है उनकी मित्रता तो एकमात्र स्वार्थ पर ही आधारित है। उधर देख सुदामा के दो मुट्ठी चावल लेकर श्यामसुन्दर ने दो लोक दे दिये, फिर भी यह दुःख बना ही रहा कि रुक्मिणी ने तीसरा लोक देने में मेरा हाथ क्यों रोक दिया और पुनः उधर देख! कुबरी सरीखी स्त्री को सुन्दरी बनाकर उससे अपनी श्रीमती लक्ष्मी सरीखा व्यवहार किया। 'कृपालु' कहते हैं-अरे मन! यह सब जानकर भी तू क्यों चूक रहा है? यह मानव देह बार बार नहीं मिलता।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 114-115