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RADHEY RADHEY

सिद्धान्त-माधुरी · पद 70

भजो रे मन! निशिदिन नंदकिशोर।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bhajo re mana! nishidina nandakishora

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1भजो रे मन! निशिदिन नंदकिशोर।

2तू भोगन भोगत नहिं तो कहँ, भोगत भोगन चोर।

3तू चह कामादिकन मिटावन, दै तिन विषयन घोर।

4पै ज्यों परत अगिनि घृत छिनछिन, बढ़त जात बरजोर।

5इमि अनुभवत अमित युग बीते, खुली आँखि नहिं तोर।

6लाइ बुझाउ “कृपालु” प्रेम जल, अबहुँ मान मन मोर॥

हिन्दी भावार्थ

अरे मन! तू निरन्तर श्यामसुन्दर का भजन कर। तू समझता है कि विषयों को मैं भोगता हूँ किन्तु सच यह है कि विषय तुझे भोग रहे हैं। तू कामादिकों को सांसारिक विषय देकर मिटाना चाहता है किन्तु जलती हुई आग में घी पड़ने के समान तेरी वासनाएं प्रतिक्षण बढ़ती जाती हैं। ऐसा अनुभव करते-करते यद्यपि तुझे अनन्त युग बीत चुके फिर भी तेरी नींद नहीं खुली। 'कृपालु' कहते हैं कि तू अब भी मेरी बात मान ले एवं श्यामसुन्दर से प्रेम कर। उन्हीं के प्रेम जल से यह तेरी कामनाओं की आग बुझ सकती है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 115