# काम प्रेम ना, प्रेम काम ना।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0076-M03-K067
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 67
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 37–37

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>काम प्रेम ना, प्रेम काम ना।  
<a id="line-2"></a>कामहिं, प्रेमहिं-नाम रहत ना, प्रेमहिं, कामहिं-नाम ना।  
<a id="line-3"></a>काम तिमिर, अरु प्रेम तिमिर हर, दोउ रहि सक इक ठाम ना।  
<a id="line-4"></a>प्रेम होत प्रेमास्पद-सुख-हित, काम धरत तहँ पाम ना।  
<a id="line-5"></a>कामहिं इक निज सुखहिं कामना, श्यामहिं-सुख कछु काम ना।  
<a id="line-6"></a>कह “कृपालु” कहुँ काम प्रेम कहँ, हो न आमना सामना॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

कामना प्रेम नहीं हो सकती, एवं प्रेम कामना नहीं हो सकता। कामना में नाममात्र को भी प्रेम नहीं रहता, एवं प्रेम में नाममात्र को भी कामना नहीं रहती। कामना अन्धकार के समान है एवं प्रेम सूर्य के प्रकाश के समान है, अतएव दोनों एक स्थान पर त्रिकाल में भी नहीं रह सकते। प्रेम में एक प्रेमास्पद के सुख का ही लक्ष्य होता है, अपने सुख की कामना का लक्ष्य लवलेश मात्र भी नहीं होता। किन्तु कामना में एकमात्र अपने सुख की ही इच्छा रहती है, प्रेमास्पद के सुख को कामना की गन्ध भी नहीं रहती 'कृपालु' कहते हैं कि निर्विवाद सिद्धान्त यह है कि प्रेम एवं कामना विरोधी होने के कारण उन दोनों का एक स्थान पर आमना-सामना ही नहीं हो सकता। भावार्थ यह है कि यदि किसी को प्रेम प्राप्त करना है तो मोक्ष पर्यन्त की कामनाओं का सर्वथा परित्याग करना होगा।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 112-113

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
