# प्राणधन जीवन कुंज बिहारी।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0073-M03-K064
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 64
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 36–36

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>प्राणधन जीवन कुंज बिहारी।  
<a id="line-2"></a>तुम तो रहे सनातन हमरे, हौं हूँ रही तिहारी।  
<a id="line-3"></a>उर लगाय भुज भरि हरि चाहे, पुरवहु आस हमारी।  
<a id="line-4"></a>चाहे मोहिं तड़पाउ मोरि मुख, पग ठुकराव मुरारी।  
<a id="line-5"></a>जेहि विधि पिवु सुख पाउ करिय सोइ, मो कहँ सोइ सुख भारी।  
<a id="line-6"></a>यह “कृपालु” है रीति प्रीति की, निज सुख चह व्यापारी॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे प्राणेश्वर! कुंजनिहारी श्रीकृष्ण! तुम ही मेरे जीवन सर्वस्व हो। हमारा-तुम्हारा यह सम्बन्ध सदा से है एवं सदा रहेगा (अज्ञानतावश मैं इस सम्बन्ध को भूल गयी)। तुम चाहे मेरा आलिंगन करके मुझे अपने गले से लगाते हुए, मेरी तड़पाते रहो, चाहे पैरों से ठोकर मार-मारकर मेरा सर्वथा परित्याग कर दो। प्राणेश्वर! तुम्हें जिस-जिस प्रकार से भी सुख मिले, वही करो मैं तुम्हारी हर इच्छा में प्रसन्न रहूँगी। कृपालु' कहते हैं कि निष्काम प्रेम का स्वरूप ही यही है कि अपनी इच्छाओं को न रखते हुए, प्रियतम की प्रसन्नता में ही प्रसन्न रहा जाय। अपने स्वार्थ के लिए प्रियतम से बदला पाने की भावना से प्रेम करना व्यवहार जगत का नाटकीय व्यापार सा ही है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 110-111

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
