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RADHEY RADHEY

श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 4

कहुँ देखे आली, ललित त्रिभंगी लाल।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kahuṁ dekhe ālī! lalita-tribhaṅgī lāla

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1कहुँ देखे आली, ललित त्रिभंगी लाल।

2जेहि सिर सोहति मोर चंद्रिका, लोचन कमल विशाल।

3भृकुटी कुटिल कनक श्रुति कुंडल, मृगमद तिलक सुभाल।

4उर फहरत पट पीत मनोहर, गल विलसत वनमाल।

5युगल पाणि मणिमय कंकण कटि, किंकिणि शब्द रसाल।

6झूमत चलत बजत पग पायल, लजवत राज मराल।

7मृदु मुसकाय बजाय मुरलि-धुनि, मोहत सब ब्रजबाल।

8सो “कृपालु” मम जीवनधन पिय, नँदनंदन गोपाल॥

हिन्दी भावार्थ

एक सखि अपनी अन्तरंग सखि से कहती है कि अरी सखि! क्या तूने कहीं ग्रीवा, कमर एवं पैर से टेढ़े श्यामसुन्दर को देखा है? जिनके सिर पर मोर के पंखों का मुकुट शोभित हो रहा है एवं जिनके नेत्र कमल के समान बड़े-बड़े हैं। जिनकी भौँहे टेढ़ी हैं एवं कानों में स्वर्ण के कुंडल तथा ललाट में कस्तूरी का तिलक शोभायमान हो रहा है। जिनके वक्षस्थल पर पीताम्बर लहरा रहा है तथा गले में सुन्दर वनमाला लटक रही है। जिनके दोनों हाथों में मणियों से जटित कंकण हैं तथा कमर में किंकिणी की मधुरध्वनि हो रही है। जिनके चरणों में नूपुर सुशोभित हैं तथा जो झूमती हुई चाल से राजहंस को भी लज्जित करते हैं। जो किंचित् मुस्कराकर मधुर मुरली को बजाते हुए समस्त ब्रज गोपांगनाओं को मोहित करते हैं। कृपालु' कहते हैं कि वे ही हमारे प्राणेश्वर प्रियतम हैं जिन्हे लोग नंदनंदन एवं गोपाल भी कहते हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 394