# कहुँ देखे आली, ललित त्रिभंगी लाल।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0392-M09-K004
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्रीकृष्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 4
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 185–185

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>कहुँ देखे आली, ललित त्रिभंगी लाल।  
<a id="line-2"></a>जेहि सिर सोहति मोर चंद्रिका, लोचन कमल विशाल।  
<a id="line-3"></a>भृकुटी कुटिल कनक श्रुति कुंडल, मृगमद तिलक सुभाल।  
<a id="line-4"></a>उर फहरत पट पीत मनोहर, गल विलसत वनमाल।  
<a id="line-5"></a>युगल पाणि मणिमय कंकण कटि, किंकिणि शब्द रसाल।  
<a id="line-6"></a>झूमत चलत बजत पग पायल, लजवत राज मराल।  
<a id="line-7"></a>मृदु मुसकाय बजाय मुरलि-धुनि, मोहत सब ब्रजबाल।  
<a id="line-8"></a>सो “कृपालु” मम जीवनधन पिय, नँदनंदन गोपाल॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक सखि अपनी अन्तरंग सखि से कहती है कि अरी सखि! क्या तूने कहीं ग्रीवा, कमर एवं पैर से टेढ़े श्यामसुन्दर को देखा है? जिनके सिर पर मोर के पंखों का मुकुट शोभित हो रहा है एवं जिनके नेत्र कमल के समान बड़े-बड़े हैं। जिनकी भौँहे टेढ़ी हैं एवं कानों में स्वर्ण के कुंडल तथा ललाट में कस्तूरी का तिलक शोभायमान हो रहा है। जिनके वक्षस्थल पर पीताम्बर लहरा रहा है तथा गले में सुन्दर वनमाला लटक रही है। जिनके दोनों हाथों में मणियों से जटित कंकण हैं तथा कमर में किंकिणी की मधुरध्वनि हो रही है। जिनके चरणों में नूपुर सुशोभित हैं तथा जो झूमती हुई चाल से राजहंस को भी लज्जित करते हैं। जो किंचित् मुस्कराकर मधुर मुरली को बजाते हुए समस्त ब्रज गोपांगनाओं को मोहित करते हैं। कृपालु' कहते हैं कि वे ही हमारे प्राणेश्वर प्रियतम हैं जिन्हे लोग नंदनंदन एवं गोपाल भी कहते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 394

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
