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RADHEY RADHEY

श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 3

अचंभो वीर! अहीर निहार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: achambho vīra! ahīra nihāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1अचंभो वीर! अहीर निहार।

2बह अनुकूल धार सब पै हौं, बहि गइ उलटी धार।

3जाति रही पनघट सिर धरि घट, घूँघट-पट मुख डार।

4मंजुल-कुंज-लतान छेड़ दइ, तान मुरलि रिझवार।

5मुरलि-तान सुनि कान, बही हौँ, गइ ढिंग नंदकुमार।

6मुरलिहिं धार “कृपालु” शिवहुँ बहि, आये रास मझार॥

हिन्दी भावार्थ

अरी सखि! अहीर के छोरा नन्दकुमार का आश्चर्यमय कार्य देख। संसार में कोई भी वस्तु नदी की अनुकूल-धारा में ही बहती है किन्तु मैं तो उल्टी धार में वह गयीं। अरी सखि घुँघट-पट से मुख ढाँक कर, सिर पर घड़ा रखकर, बड़ी सावधानी से, नटखट की आँखों से बचकर, पनघट जा रही थी। इतने में ही उस छलिया ने लताओं की ओट में छिपकर आ की तान छेड़ दी। मुरली की तान की धारा कान म पड़ते ही मैं परवश होकर मुरली मनोहर के पास जा पहुँची और बंटाढार हो गया। 'कृपालु' कहते हैं-अरी सखि। र तो थोड़ी ही दूर बहकर गयी किन्तु इस मुरली की धारा में वह कर भगवान् शंकर कैलाश-पर्वत से रास-मण्डल में अ गये थे।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 393-394