श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 2
अनोखो जायो जशुदा लाल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: anokho, jāyo jashudā lāla
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अनोखो जायो जशुदा लाल।
2मोर मुकुट की लटक अनोखी, तैसेहिं लट घुँघराल।
3भृकुटि बंक की मटक अनोखी, तैसेहिं तिलक सुभाल।
4चितवनि जादूभरी अनोखी, तैसेहिं नैन विशाल।
5मधुर मधुर मुसकानि अनोखी, तैसेहिं गल वनमाल।
6पीतांबर फहरानि अनोखी, तैसेहिं काछनि लाल।
7नूपुर की झनकार अनोखी, तैसेहिं चाल मराल।
8ग्रीवा-कटि-पद-मुरनि अनोखी, तैसेहिं मुरलि रसाल।
9है “कृपालु” सब बात अनोखी, फँसे शंभु शुक जाल॥
हिन्दी भावार्थ
आ यशोदा मैया ने अनोखा पुत्र पैदा किया है, जिसकी मोर मुकुट की लटक एवं घुँघराली लट अत्यन्त अनोखी हैं। उनको टेढ़ी भौंहों की मटक एवं ललाट में लगा हुआ तिलक भी अत्यन्त अनोखा है। उनका जादू भरा देखना एवं जादू भरे चैन भी अत्यन्त विलक्षण हैं उनकी मीठी मुस्कराहट एवं गले की वनमाला भी अत्यन्त अनोखी है। पीताम्बर की फहरान और लाल काछनी अत्यधिक अनोखी है। उनके नूपुर की चनि एवं हंस के समान चाल भी अत्यन्त विलक्षण है। उनकी था मधुर मुरली तो अत्यन्त ही अनोखी है। 'कृपालु' कहते हैं कि उनकी सभी बातें इतनी अनोखी हैं कि योगीराज शंकर एवं परमहँस शुकदेव तक उनके जाल में फँसे हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 392-393