# अनोखो जायो जशुदा लाल।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0390-M09-K002
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्रीकृष्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 2
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 184–185

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>अनोखो जायो जशुदा लाल।  
<a id="line-2"></a>मोर मुकुट की लटक अनोखी, तैसेहिं लट घुँघराल।  
<a id="line-3"></a>भृकुटि बंक की मटक अनोखी, तैसेहिं तिलक सुभाल।  
<a id="line-4"></a>चितवनि जादूभरी अनोखी, तैसेहिं नैन विशाल।  
<a id="line-5"></a>मधुर मधुर मुसकानि अनोखी, तैसेहिं गल वनमाल।  
<a id="line-6"></a>पीतांबर फहरानि अनोखी, तैसेहिं काछनि लाल।  
<a id="line-7"></a>नूपुर की झनकार अनोखी, तैसेहिं चाल मराल।  
<a id="line-8"></a>ग्रीवा-कटि-पद-मुरनि अनोखी, तैसेहिं मुरलि रसाल।  
<a id="line-9"></a>है “कृपालु” सब बात अनोखी, फँसे शंभु शुक जाल॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

आ यशोदा मैया ने अनोखा पुत्र पैदा किया है, जिसकी मोर मुकुट की लटक एवं घुँघराली लट अत्यन्त अनोखी हैं। उनको टेढ़ी भौंहों की मटक एवं ललाट में लगा हुआ तिलक भी अत्यन्त अनोखा है। उनका जादू भरा देखना एवं जादू भरे चैन भी अत्यन्त विलक्षण हैं उनकी मीठी मुस्कराहट एवं गले की वनमाला भी अत्यन्त अनोखी है। पीताम्बर की फहरान और लाल काछनी अत्यधिक अनोखी है। उनके नूपुर की चनि एवं हंस के समान चाल भी अत्यन्त विलक्षण है। उनकी था मधुर मुरली तो अत्यन्त ही अनोखी है। 'कृपालु' कहते हैं कि उनकी सभी बातें इतनी अनोखी हैं कि योगीराज शंकर एवं परमहँस शुकदेव तक उनके जाल में फँसे हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 392-393

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
