श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 1
अनुपम रूप नीलमणि को री।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: anupama rūpa nīlamaṇi ko rī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अनुपम रूप नीलमणि को री।
2उर धरि कर करि हाय! गिरत सोइ, लखत बार इक भूलेहुँ जो री।
3प्रति अंगनि छवि कोटि अनंगनि, सुषमा-सुधा-सार-रस बोरी।
4जिनहिंन अंगनि नैनन निरखत, तिनहिंन कहँ कह सरस बड़ो री।
5नखशिख लखि सखि अँखियन हूँ ते, पलपल तलफति देखन को री।
6कह “कृपालु” गागर महँ सागर, आव न यतन करोर करो री॥
हिन्दी भावार्थ
नीलमणि श्यामसुन्दर के सौन्दर्य का वर्णन सर्वथा अनिर्वचनीय है। जो भी, भूलकर भी, एक-बार भी, उस रूपमाधुरी का दर्शन कर लेता है वह हृदय पर हाथ रखकर एवं हाय! कह कर मूर्च्छित होकर गिर पड़ता है। उनके प्रत्येक अंगों की रूपमाधुरी पर करोड़ों कामदेव न्यौछावर हैं। ऐसी उनकी छवि सौन्दर्य के अमृत के सार के रस में डुबोई हुई है। एक विलक्षणता यह भी है-उनके नख से शिख तक समस्त अंगों को आँखों से देखकर भी तृप्ति नहीं होती है। उनके जिन अंगों को आँख देखती है उन्हीं अंगों को और अंगों से अधिक सरस अनुभव करती है। आँखें प्रतिक्षण पुनः पुनः देखने को तड़पती ही रहती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि प्राकृत इन्द्रिय मन बुद्धि रूपी घड़े में दिव्यानन्द रूपी समुद्र नहीं समा सकता, भले ही कोई करोड़ों प्रयत्न क्यों न करे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 391-392