श्री राधा-बाल लीला-माधुरी · पद 23
माय! मोहिं सखियन बहुत चिढ़ाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: māya! mohiṁ sakhiyana bahuta chid̤hāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1माय! मोहिं सखियन बहुत चिढ़ाय।
2कहति सगाई होति जासु तव, सो कारो तनु आय।
3हम सब की तो करी सगाई, गोरे तनु मम माय।
4जो यह साँचु माय! नहिं करिहौं, कबहुँ सगाई वाय।
5बड़े भये लाली! सब कारे, गोरे तनु बनि जाय।
6तब तो माय! सबै गोरे तनु, कारो तनु पुनि पाय।
7हाँ री कुँवरि! साँच यह, तब तो, जैहैं सखि खिसियाय।
8कह “कृपालु” कारो तनु रामहुँ, जेहि भगवान बताय॥
हिन्दी भावार्थ
छोटी-सी किशोरी जी झुँझलाकर कहती हैं-''अरी मैया! सखियाँ मुझे बहुत चिढ़ाती हैं, कहती हैं कि जिससे तेरी सगाई हो रही है वह काले रंग का है, और यह भी कहती हैं कि हम लोगों की मैया ने हम लोगों की सगाई तो गोरे-गोरे शरीर वालों से की है। मैया कान खोलकर सुन ले, अगर यह सच है तो मैं उससे कभी सगाई नहीं करूँगी।''मैया ने कहा-''अरी लाली! बड़े होने पर सब काले रंग वाले गोरे रंग वाले हो जाते हैं।''किशोरी जी ने कहा-''अरी मैया। तब तो बड़े होने पर सब गोरे रंग वाले काले हो जाते होंगे।'मैया ने कहा-'हाँ री लाली! तू सच कहती है'! किशोरी जी ने कहा-''तब तो मैया बड़े होने पर सब सखियाँ खिसिया जायेंगी।'इतने में 'कृपालु' ने कहा-'अरी लाली! काला रंग तो राम का भी था जिनको महात्मा लोग भगवान् बताते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 387-388