श्री राधा-बाल लीला-माधुरी · पद 22
माय ते कुंवरि कहति तुतराय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: māya te, kuṁvari kahati tutarāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1माय ते कुंवरि कहति तुतराय।
2खेलत रही संग ललितादिक, अबहिं पौरिया माय।
3इतनेहिं माहिं माय इक बाबा, कर वीणा ले आय।
4इकटक लखन लग्यो पुनि मों कहँ, नैनन नीर बहाय।
5पुनि किय सात प्रदक्षिण दक्षिण, राधे राधे गाय।
6सुनु मैया! पुनि लियो बलैया, पुनि लिय पद-रज खाय।
7जब ललिता ने पूछी बाबा! आपुन नाम बताय।
8तब मैया! सो अट्टहास करि, तुरतहिं भाज्यो धाय।
9मैंने कही"अरी ललिता यह", पगलो मोहिं जनाय।
10क्यों मैया! हौं सही कही ना?, तू तो जनु डरपाय।
11अरी लाड़ली! नारद मुनि सो, मो कहँ कत न बुलाय।
12पूछति कुँवरि “कृपालु” मातु इन, लागी कौन बलाय॥
हिन्दी भावार्थ
छोटी-सी किशोरी जी कीर्ति-मैया से तुतला कर कहती हैं-''अरी मैया! मैं अभी ललितादिक सखियों के साथ ड्योढ़ी पर खेल रही थी, इतने में ही हाथ में वीणा लेकर एक बाबा आ गया। वह बाबा एकटक मुझे देखने लगा और आँखों से आँसू बहाने लगा। फिर राधे राधे! कहकर उसने मेरी सात प्रदक्षिणा की। अरी मैया! फिर उसने मेरी बलैया ली, फिर मेरे पैर के नीचे की धूल खा ली। जब ललिता ने पूछा अरे बाबा तुम्हारा नाम क्या है? तब मैया वह बाबा अट्टहास करता हुआ तुरन्त भाग गया। मैंने ललिता सखि से कहा-'यह तो कोई पगला है'क्यों मैया! मैंने ठीक कहा न? तू तो जैसे डरी जा रही है।''मैया ने कहा-''अरी लाली! वे बाबा नारद-मुनि थे तूने मुझे क्यों नहीं बुलाया?'''कृपालु' के शब्दों में छोरी सी किशोरी जी अत्यन्त भोलेपन से पूछती हैं-''अरी मैया! इन नारद मुनि को कोई बला लग गई है क्या?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 386-387