श्री राधा-बाल लीला-माधुरी · पद 21
खाय अब माखन मोरि बलाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: khāya aba mākhana mori balāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1खाय अब माखन मोरि बलाय।
2रूठी भानुकुँवरि मैया ते, लखि मैया बलि जाय।
3ऊँ ऊँ, करि जब लोटन लागी, लिय उठाय तब माय।
4पूछति मातु कहा लैहौ तुम, कुँवरि कहति तुतराय।
5सबै सखिन की भई-सगाई, सखियन मोहिं चिढ़ाय।
6कीरति कहीं, कुँवरि! तू अबहीं, पांच बरस की आय।
7करिहौं तोर सगाई अस जेहि, लखि सब सखि ललचाय।
8हँसीं “कृपालु” कुँवरि अति भोरी, कीरति कंठ लगाय॥
हिन्दी भावार्थ
छोटी-सी किशोरी जी मैया से रूठकर कहती हैं-''अरी मैया! अब मेरी बलाय मक्खन खाये अर्थात् मैं मक्खन नहीं खाऊँगी।'"कीर्ति मैया रूठी हुई किशोरी जी की छवि पर बलिहार जाती हैं। तत्पश्चात् किशोरी जी ऊँ-ऊँ करके जमीन पर लोटने लगीं। यह देखकर मैया ने गोद में उठा लिया। और कहा, ''अरी लाली! तुझे क्या चाहिये? किशोरी जी ने तोतली भाषा में कहा-'अरी मैया! सब सखियों की सगाई हो गयी, केवल मेरी नहीं हुई। सब सखियाँ मुझे चिढ़ाती हैं।'मैया ने कहा-''अरी लाली! अभी तू पाँच वर्ष की तो है ही; मैं तेरी सगाई ऐसी बढ़िया करूँगी कि सब सखियाँ देख देखकर ललचायेंगी।''कृपालु' कहते हैं कि भोली-भाली किशोरी जी ने यह सुनकर हँस दिया और मैया ने कंठ से लिपटा लिया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 385-386