# खाय अब माखन मोरि बलाय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0386-M08-K021
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री राधा-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 21
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 181–182

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>खाय अब माखन मोरि बलाय।  
<a id="line-2"></a>रूठी भानुकुँवरि मैया ते, लखि मैया बलि जाय।  
<a id="line-3"></a>ऊँ ऊँ, करि जब लोटन लागी, लिय उठाय तब माय।  
<a id="line-4"></a>पूछति मातु कहा लैहौ तुम, कुँवरि कहति तुतराय।  
<a id="line-5"></a>सबै सखिन की भई-सगाई, सखियन मोहिं चिढ़ाय।  
<a id="line-6"></a>कीरति कहीं, कुँवरि! तू अबहीं, पांच बरस की आय।  
<a id="line-7"></a>करिहौं तोर सगाई अस जेहि, लखि सब सखि ललचाय।  
<a id="line-8"></a>हँसीं “कृपालु” कुँवरि अति भोरी, कीरति कंठ लगाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

छोटी-सी किशोरी जी मैया से रूठकर कहती हैं-''अरी मैया! अब मेरी बलाय मक्खन खाये अर्थात् मैं मक्खन नहीं खाऊँगी।'"कीर्ति मैया रूठी हुई किशोरी जी की छवि पर बलिहार जाती हैं। तत्पश्चात् किशोरी जी ऊँ-ऊँ करके जमीन पर लोटने लगीं। यह देखकर मैया ने गोद में उठा लिया। और कहा, ''अरी लाली! तुझे क्या चाहिये? किशोरी जी ने तोतली भाषा में कहा-'अरी मैया! सब सखियों की सगाई हो गयी, केवल मेरी नहीं हुई। सब सखियाँ मुझे चिढ़ाती हैं।'मैया ने कहा-''अरी लाली! अभी तू पाँच वर्ष की तो है ही; मैं तेरी सगाई ऐसी बढ़िया करूँगी कि सब सखियाँ देख देखकर ललचायेंगी।''कृपालु' कहते हैं कि भोली-भाली किशोरी जी ने यह सुनकर हँस दिया और मैया ने कंठ से लिपटा लिया।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 385-386

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
