श्री राधा-बाल लीला-माधुरी · पद 20
मैया! मोहिं भैया बहुत रुवाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: maiyā! mohiṁ bhaiyā bahuta ruvāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मैया! मोहिं भैया बहुत रुवाय।
2मेरी गुड़िया गुड़रा लै लै, इत उत कतहुँ छुपाय।
3तू श्रीदामहिं कहति नाहिं कछु, मोहीं काहिं रिसाय।
4सुनि लाली की बात मात ने, श्रीदामाहिं बुलाय।
5श्रीदामा कह याउ लेति नित, लकुटी मोरि चुराय।
6कहति “कृपालु” मातु दोउन ते, झगरत बहिन न भाय॥
हिन्दी भावार्थ
छोटी-सी किशोरी जी कीर्ति-मैया से श्रीदामा भैया की बुराई करती हुई कहती हैं, "अरी मैया! रुलाते हैं। मेरी गुड़िया-गुड्डा लेकर इधर-उधर कहीं छिपा देते हैं। तू श्रीदामा को नहीं डाँटती, मेरे ऊपर ही क्रोध करती है। लाली की बात सुनकर मैया ने श्रीदामा को बुलाया। ने सफाई देते हुए कहा-'"मैया! है, तब मैं इसकी गुड़िया-गुड्डा चुराता हूँ। शब्दों में मैया ने दोनों को डाँटते हुए कहा-'यह बहुत बुरी बात है, भला कहीं बहिन और भैया परस्पर झगड़ा करते हैं?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 384-385