श्री राधा-बाल लीला-माधुरी · पद 19
माय मोहिं भैया बहुत खिझाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: māya mohiṁ bhaiyā bahuta khijhāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1माय मोहिं भैया बहुत खिझाय।
2कुँवरि कहति मैया! श्रीदामहिं, हौं न बनैहौं भाय।
3आजु गई रहि खेलन कुंजन, संग सखिन समुदाय।
4श्रीदामा प्रथमहिं कुंजन महँ, छुपि के बैठ्यो जाय।
5कामरि ओढ़ि भूत बनि हम कहँ, औचक दियो डराय।
6बोल भयानक बोलि कह्यो पुनि, हौं हाऊ तोहिं खाय।
7भाजत भाजत हारि गई तब, कह्यो प्रकटि"हौं आय"।
8कहति “कृपालु” माय आवन दे, मरिहौं साँटिन वाय॥
हिन्दी भावार्थ
छोटी-सी किशोरी जी कीर्ति-मैया से श्रीदामा-भैया को शिकायत करती हैं-''अरी मैया! श्रीदामा-भैया मुझे बहुत तंग करते हैं। मैं उनको भैया नहीं बनाऊँगी। अरी मैया! आज मैं अपनी सखियों के साथ निकुंज में खेलने गई थी। श्रीदामा भैया उसी कुंज में पहले से ही छुपकर बैठे थे। कम्बल ओढ़कर भूत बनकर अचानक हम सब को डरा दिया। अरी मैया! बड़ी डरावनी बोली में भैया ने कहा-''मैं हाऊ हूँ आज तुम लोगों को खाऊँगा'हम लोग भागते- भागते थक गए। तब कम्बल हराकर भैया ने कहा-''अरे मैं श्रीदामा हूँ।"""कृपालु' के शब्दों में मैया ने किशोरी जी को सांत्वना देते हुए कहा-'अरी लाली! श्रीदामा को आने दे आज उसे साँटियों से खूब मारूँगी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 384