श्री राधा-बाल लीला-माधुरी · पद 18
मातु! यह कुँवरि न मानति बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mātu! yaha kuṁvari na mānati bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मातु! यह कुँवरि न मानति बात।
2श्रीदामा कह मातु! हमारे, संग न खेलन जात।
3सुनु मैया! इक यशुमति ढोटा, है कोउ श्यामल गात।
4वाही संग सदा यह खेलति, करत जोइ मनभात।
5कुँवरि कहीं सुनु मैया! भैया, मोर खार नित खात।
6देत न दाउँ हारि खेलन महँ, ऊपर ते रिसियात।
7कबहुँक भरत चहुँटिया कबहुँक, मोहिं डरावत मात।
8कबहुँ चिर्हावत कबहुँ बिरावत, कबहुँ दिखावत दाँत।
9कह “कृपालु” यह बात बुरी कहुँ, झगरत भगिनी भ्रात॥
हिन्दी भावार्थ
छोटे से श्रीदामाजी कीर्ति मैया से छोटी-सी किशोरी जी की शिकायत कर रहे हैं-''अरी मैया! बात नहीं मानती यह हमारे साथ खेलने भी नहीं जाती। मैया! सुन, यशोदा का एक छोटा-सा छोरा है जो कि काले रंग का है। उसी के साथ खेलती है, मेरी एक भी बात नहीं मानती।''किशोरी जी ने कहा-'अरी मैया! हमेशा मेरी खार खाते रहते हैं। देते, ऊपर से मेरे ही ऊपर गुस्सा होते हैं। मुझे काट लेते हैं, कभी मुझे डरावने भेष से डराते हैं। अरपरे शब्दों से मुझे चिढ़ाते हैं, कभी मुँह बनाकर मुझे बिराते हैं और कभी दाँत दिखाते हैं। यह बुरी बात है तुम दोनों तो अच्छे बच्चे हो फिर भला कहीं भाई-बहिन भी आपस में झगड़ा करते हैं?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 383