श्री राधा-बाल लीला-माधुरी · पद 17
बनाई गुड़िया गुड़रा माय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: banāī gud̤iyā gud̤arā māya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1बनाई गुड़िया गुड़रा माय।
2गुड़ियहिं रंग रूप छवि ऐसी, जैसी कुँवरि जनाय।
3गुड़रहिं रंग रूप छवि ऐसी, जैसी छवि बलभाय।
4गुड़रहिं रंग श्याम लखि श्यामा, पुनि गइ कछुक रिसाय।
5कहति कुँवरि यह गुड़रा कारो, नहिं गुड़ियहिं मन भाय।
6कह मैया कारो रंग हरि को, जो सब काहिं बनाय।
7कह “कृपालु” कह मातु साँचु यह, आगे परी लखाय॥
हिन्दी भावार्थ
छोटी सी किशोरी जी के आग्रह पर कीर्ति मैया ने खेलने के लिये गुड़िया-गुड्डे बना दिये। रूप तथा सुन्दरता ठीक किशोरी जी की भाँति ही बनाये। गुड्डे का रंग, रूप एवं सुन्दरता श्यामसुन्दर के समान बनाये। गुड्डे का रंग काला देखकर किशोरी जी मुँह लटका कर रूठ गयीं, और कहा-'इस काले-काले गुङ्डे को हमारी गोरी सी गुड़िया कैसे ब्याहेगी?''कीर्ति मैया ने कहा-"'अरी लाली! जिस भगवान् ने सम्पूर्ण संसार को बनाया है उसका भी रंग तो काला ही है।''इतने में 'कृपालु' ने किशोरी जी से कहा-''मैया ठीक कहती है-इसका प्रमाण कुछ दिनों बाद अनुभव द्वारा तुम्हें भी मिल जायेगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 382