श्री राधा-बाल लीला-माधुरी · पद 16
माय! अस गुड़िया मोहिं बनाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: māya! asa gud̤iyā mohiṁ banāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1माय! अस गुड़िया मोहिं बनाय।
2जाकी निरखि सुघर सुंदरता, गुड़रा जिय ललचाय।
3भूषन-वसन पिन्हाउ वाय अस, जस कहुँ सखिन न पाय।
4पुनि बनाउ अस सुंदर गुड़रा, लखि गुड़िया मनभाय।
5नख शिख करि श्रृंगार दुहुँन सिर, सेहरा देउ बँधाय।
6कह “कृपालु” तब कुंवरि सखिन लै, दोउन ब्याहु कराय॥
हिन्दी भावार्थ
छोटी-सी किशोरी जी कीर्ति मैया से कहती हैं मैया! मुझे ऐसी बढ़िया गुड़िया बना दे जिसकी सुन्दरता देख कर गुङ्डे का मन ललचा जाय। और मैया! उस गुड़िया को ऐसे कपड़े एवं गहने पहिना दे जो सखियों को कहीं न मिलें। फिर मैया गुड्डा भी. इतना सुन्दर बना दे कि उसे देखकर गुड़िया का मन ललचा जाय। दोनों का नख से शिख तक सुन्दर शृंगार करके, दोनों को सेहरा बाँध दे। 'कृपालु' कहते हैं-'"हाँ मैया! ऐसा कर दे, तब हमारी छोटी-सी किशोरी जी सखियों को लेकर गुड़िया-गुड्डा का ब्याह रचायेंगी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 381-382