श्री राधा-बाल लीला-माधुरी · पद 15
मातु! अब तो सन करहुँ न बात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mātu! aba to sana karahuṁ na bāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मातु! अब तो सन करहुँ न बात।
2कहति कुँवरि कीरति मैया सों, रूठि वचन तुतरात।
3कहा बात कह मातु कुँवरि ते, कहा इतै रिसियात।
4गुडिया अरु गुड़रा सखियन की, दिय बनाय उन मात।
5तू नहिं सुनति कहति दिन द्वै ते, इमि कहि रोवति जात।
6हौं न चहौं तोरी सी मैया, श्रीदामा सों भ्रात।
7निज अंचल-पट पोंछि नैन जल, कह मैया मुसकात।
8दऊँ बनाय “कृपालु” अबहिं तोहिं, गुड़िया कहु जेहि भाँत॥
हिन्दी भावार्थ
छोटी-सी किशोरी जी कहती हैं-''अरी मैया! अब तुझसे कभी बात नहीं करूँगी। और तोतली भाषा में कह रही हैं। लाली! क्यों इतना गुस्सा कर रही है'? सब सखियों की माताओं ने तो उनके लिए गुड्या-गुड्डा बना दिया है किन्तु मैं दो दिन से कह रही हूँ तू मेरी नहीं सुनती।'इस प्रकार किशोरी जी कहती हुई रोती जाती हैं। तेरी-सी मैया नहीं चाहती एवं श्रीदामा सा भैया भी नहीं चाहती '। कीर्ति मैया ने किशोरी जी को गोद में बिठाकर अपने आँचल से आँसुओं को पोंछ कर मुस्कराते हुए 'कृपालु' के शब्दों में कहा-'अरी लाली! ले अभी तू जैसी कहे तेरे लिये गुड़िया गुड्डा बना देती हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 380-381