श्री राधा-बाल लीला-माधुरी · पद 14
कुँवरि! जा खेलु लतान तरे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kuṁvari! jā khelu latāna tare
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कुँवरि! जा खेलु लतान तरे।
2कहा करेगी जानि सगाई, पाछे वृथहिं परे।
3ऊँ, ऊँ, करि पटकति पग भू पर, झगरति नैन झरे।
4मैया कह, सुनु कुँ वरि! कान महँ, रहियो उरहिं धरे।
5तू जिमि गुड़ियहिं ब्याहु करति नित, तिमि सो ब्याहु करे।
6कह “कृपालु” किलकारि कुँवरि द्रुत, करि दे ब्याहु अरे॥
हिन्दी भावार्थ
छोटी-सी भोरी-भारी किशोरी जी के 'सगाई'का अर्थ पूछने पर कीर्ति मैया प्यार-भरी डाँट में डाँटती हुई में डांटती हुई कहती हैं- ''अरी लाली! क्यों अकारण पीछे पड़ी है? सगाई का अर्थ जान कर तू क्या करेगी? जा कुंज लताओं में खेल।''किन्तु किशोरी जी मैया की बात नहीं सुनतीं, ऊँ ऊँ करके पृथ्वी पर पैर पटकती हैं एवं आँखों से आँसू बहाती हुई झगड़ा करती हैं। यह देख कर मैया ने किशोरी जी के कान में कहा कि सगाई का अर्थ चुपके से बता रही हूँ और किसी से न बताना। देख लाली! जिस प्रकार तू गुड़िया-गुड्डा का ब्याह रचाती है उसी प्रकार नन्दलाल से तेरा ब्याह होगा। कृपालु' कहते हैं कि यह सुन कर भोली-भाली भानुदुलारी किलकारी मार कर हँसने लगीं और उछलते हुए बोलीं-''अरी मैया तब तो अभी मेरा ब्याह कर दे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 379-380