# बनाई गुड़िया गुड़रा माय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0382-M08-K017
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री राधा-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 17
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 179–180

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>बनाई गुड़िया गुड़रा माय।  
<a id="line-2"></a>गुड़ियहिं रंग रूप छवि ऐसी, जैसी कुँवरि जनाय।  
<a id="line-3"></a>गुड़रहिं रंग रूप छवि ऐसी, जैसी छवि बलभाय।  
<a id="line-4"></a>गुड़रहिं रंग श्याम लखि श्यामा, पुनि गइ कछुक रिसाय।  
<a id="line-5"></a>कहति कुँवरि यह गुड़रा कारो, नहिं गुड़ियहिं मन भाय।  
<a id="line-6"></a>कह मैया कारो रंग हरि को, जो सब काहिं बनाय।  
<a id="line-7"></a>कह “कृपालु” कह मातु साँचु यह, आगे परी लखाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

छोटी सी किशोरी जी के आग्रह पर कीर्ति मैया ने खेलने के लिये गुड़िया-गुड्डे बना दिये। रूप तथा सुन्दरता ठीक किशोरी जी की भाँति ही बनाये। गुड्डे का रंग, रूप एवं सुन्दरता श्यामसुन्दर के समान बनाये। गुड्डे का रंग काला देखकर किशोरी जी मुँह लटका कर रूठ गयीं, और कहा-'इस काले-काले गुङ्डे को हमारी गोरी सी गुड़िया कैसे ब्याहेगी?''कीर्ति मैया ने कहा-"'अरी लाली! जिस भगवान् ने सम्पूर्ण संसार को बनाया है उसका भी रंग तो काला ही है।''इतने में 'कृपालु' ने किशोरी जी से कहा-''मैया ठीक कहती है-इसका प्रमाण कुछ दिनों बाद अनुभव द्वारा तुम्हें भी मिल जायेगा।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 382

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
