# माय ते कुंवरि कहति तुतराय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0387-M08-K022
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री राधा-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 22
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 182–182

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>माय ते कुंवरि कहति तुतराय।  
<a id="line-2"></a>खेलत रही संग ललितादिक, अबहिं पौरिया माय।  
<a id="line-3"></a>इतनेहिं माहिं माय इक बाबा, कर वीणा ले आय।  
<a id="line-4"></a>इकटक लखन लग्यो पुनि मों कहँ, नैनन नीर बहाय।  
<a id="line-5"></a>पुनि किय सात प्रदक्षिण दक्षिण, राधे राधे गाय।  
<a id="line-6"></a>सुनु मैया! पुनि लियो बलैया, पुनि लिय पद-रज खाय।  
<a id="line-7"></a>जब ललिता ने पूछी बाबा! आपुन नाम बताय।  
<a id="line-8"></a>तब मैया! सो अट्टहास करि, तुरतहिं भाज्यो धाय।  
<a id="line-9"></a>मैंने कही"अरी ललिता यह", पगलो मोहिं जनाय।  
<a id="line-10"></a>क्यों मैया! हौं सही कही ना?, तू तो जनु डरपाय।  
<a id="line-11"></a>अरी लाड़ली! नारद मुनि सो, मो कहँ कत न बुलाय।  
<a id="line-12"></a>पूछति कुँवरि “कृपालु” मातु इन, लागी कौन बलाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

छोटी-सी किशोरी जी कीर्ति-मैया से तुतला कर कहती हैं-''अरी मैया! मैं अभी ललितादिक सखियों के साथ ड्योढ़ी पर खेल रही थी, इतने में ही हाथ में वीणा लेकर एक बाबा आ गया। वह बाबा एकटक मुझे देखने लगा और आँखों से आँसू बहाने लगा। फिर राधे राधे! कहकर उसने मेरी सात प्रदक्षिणा की। अरी मैया! फिर उसने मेरी बलैया ली, फिर मेरे पैर के नीचे की धूल खा ली। जब ललिता ने पूछा अरे बाबा तुम्हारा नाम क्या है? तब मैया वह बाबा अट्टहास करता हुआ तुरन्त भाग गया। मैंने ललिता सखि से कहा-'यह तो कोई पगला है'क्यों मैया! मैंने ठीक कहा न? तू तो जैसे डरी जा रही है।''मैया ने कहा-''अरी लाली! वे बाबा नारद-मुनि थे तूने मुझे क्यों नहीं बुलाया?'''कृपालु' के शब्दों में छोरी सी किशोरी जी अत्यन्त भोलेपन से पूछती हैं-''अरी मैया! इन नारद मुनि को कोई बला लग गई है क्या?

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 386-387

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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