श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 5
कहुँ देखे जशुदा लाल रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kahuṁ dekhe jashudā lāla re
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कहुँ देखे जशुदा लाल रे।
2केकी-पक्ष शीश पै जाके, अलकनि बिखरी गाल रे।
3जाके सरस रसीले नैना, केसर तिलक सुभाल रे।
4जाके कंध लकुटि अरु कामरि, गल कौस्तुभमणि माल रे।
5कटि किंकिनि पग पायल जाके, हंस लजावनि चाल रे।
6जाके अंग “कृपालु” त्रिभंगी, बैनन वेनु रसाल रे॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखि दूसरी सखि से कहती है कि अरी सखि! क्या तूने कहीं श्यामसुन्दर को देखा है? जिनके सिर पर मोर चन्द्रिका सुशोभित है और धुँघराली अलके गाल पर लहरा रही हैं। जिनके अत्यन्त रसीले नेत्र हैं एवं ललाट में केशर का तिलक है तथा जिनके कंधे पर लठिया व कामरी सुशोभित है एवं गले में कौस्तुभ मणि की माला लटक रही है। जिनकी कमर में किंकिनी, पैर में पायल अलंकृत हैं और जिनकी चाल हंसों की चाल को भी लज्जित करती है। 'कृपालु' कहते हैं कि जिनके अंग तीन स्थान से टेढ़े हैं एवं मधुर मुरली बजा रहे हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 395