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RADHEY RADHEY

श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 6

कान्ह की जादूभरी मुसकान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kānha kī jādū bharī musakāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1कान्ह की जादूभरी मुसकान।

2जिन देखी तिन बिसरी गई छिन, लोक-वेद-कुल कान।

3जिन नहिं देखी तिन देखन कहँ, टेरत मुरलिहिं तान।

4जिन नहिं देखी, सुनी तिनहुँ मन, लहकत सुनि गुन-गान।

5जिन नहिं भान तनुहुँ तिन ज्ञानिहुँ, छुटत समाधिन ध्यान।

6देत “कृपालु” चुनौती हरि कहँ, मोहिं मोहहु तब जान॥

हिन्दी भावार्थ

हमारे श्यामसुन्दर की मुस्कान में अनोखा जादू भरा हुआ है। जिसने भी उस मधुर मुस्कान को देख लिया, वह एक क्षण में ही समस्त लोक, वेद, कुल की मर्यादाओं को खो बैठा। जिसने उस मुस्कान को नहीं देखा उसको दिखाने के लिए बे मुरली बजाते हैं। मुरली की तान भी नहीं सुनी उसका भी मन श्यामसुन्दर के गुणों को सुन-सुन कर ललचाता रहता है। जिनको इन्द्रियादि शरीर का भान तक नहीं रहता उन परमहंसों का भी समाधिस्थ ध्यान छूट जाता है, किन्तु 'कृपालु' कहते हैं कि मैं श्यामसुन्दर को चुनौती देता हूँ कि वे मुझे नहीं मोहित कर सकते, यदि कर सकते हैं तो करके बतावें।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 395-396