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RADHEY RADHEY

श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 7

कुंज बिच विहरत कुंज बिहारी।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kuñja bicha biharata kuñja-bihārī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1कुंज बिच विहरत कुंज बिहारी।

2लै अरविंद वृंद कर पिवु को, सजवति नखशिख प्यारी।

3पीत पाग पर अरुण-कमल धरि, बलि बलि जात निहारी।

4पीत कमल की नवल कलिन लै, करनफूल श्रुतिधारी।

5नील कमल को बलय युगल कर, लटकनि कलिन सँवारी।

6नील पीत अरु अरुण कमल की, गर मनहर माला री।

7करि “कृपालु” श्रृंगार लली इमि, लखि निज सुरति बिसारी॥

हिन्दी भावार्थ

लताओं के कुंज में कुंजबिहारी श्रीकृष्ण मधुर विहार कर रहे हैं। श्री किशोरी जी श्रीश्यामसुन्दर का नख से शिख तक कमल के फूलों से शृंगार कर रही हैं। पीली पगड़ी पर लाल कमल का शृंगार किया है एवं उसे देख-देखकर प्रेम विभोर हो रही हैं। पीले कमल की नई-नई कलियों के कर्णफूल पहनाये हैं, नीले कमल के कंकण दोनों हाथों में पहनाये हैं एवं कलियों की लटकन लगाये हैं। नीले, लाल एवं पीले कमलों की सुन्दर माला गले में पहनाई है। 'कृपालु' कहते हैं कि किशोरी जी इस प्रकार कमल के फूलों का शृंगार करके आनंद में विभोर हो रही हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 396-397