श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 8
खरे हरि कुंज-लतान तरे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: khare hari kuñja-latāna tare
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1खरे हरि कुंज-लतान तरे।
2सा रे ग म प ध नि सुरन सों पुनि पुनि, मुरलिहिं तान भरे।
3तानन श्री वृषभानुलली के, गुनगन गान करे।
4करत ललिहिं गुन-गान मूँदि दृग, तिनकोइ ध्यान धरे।
5धरत ध्यान देखन कहँ छिन छिन, नैनन प्रान लरे।
6परत “कृपालु” आन जब प्रानन, तब ही जानि परे॥
हिन्दी भावार्थ
श्री श्यामसुन्दर निकुंज में लताओं के नीचे खड़े हैं। सरे गमप ध नि इन सात स्वरों के विविध आरोह-अवरोह के द्वारा बार-बार मुरली बजा रहे हैं एवं उसी मुरली में श्री वृषभानुनन्दिनी राधा के गुणों को गा रहे हैं। उन्हीं का ध्यान् भी कर रहे हैं। उन्हीं के ध्यान में अनुरक्त श्यामसुन्दर के नेत्र एवं प्राण परस्पर झगड़ा कर रहे हैं। झगड़ा यह है कि ये दोनों ही एक दूसरे से प्रथम ही किशोरी जी से मिलना चाहते हैं। कृपालु' कहते हैं जब किसी के ऊपर कोई विपत्ति आ जाती है तभी उसको अनुभव होता है। तात्पर्यं यह है कि सनातन आनंदमय ब्रह्म को भी श्री किशोरी जी के वियोग में रोना पड़ता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 397