श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 9
चलत झुकि झूमि झूमि नँदलाल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chalata jhuki, jhūmi jhūmi naṁdalāla
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1चलत झुकि झूमि झूमि नँदलाल।
2इत उत लखत चपल चितवनि ते, घूमि घूमि गोपाल।
3अलकनि झूमि झूमि मुख चूमति, घूमि घूमि घुँघराल।
4पुनि पुनि मोर-मुकुट झुकि झूमत, चूमत कुंडल गाल।
5झूमत गुंजमाल गल चूमति, बेसर अधर रसाल।
6मुरलि “कृपालु” झूमि झुकि चूमत, सर्वाधिक मुख लाल॥
हिन्दी भावार्थ
हमारे श्यामसुन्दर झुक-झुककर झूमते हुए चलते हैं। वे अपने चंचल नेत्रों से इधर-उधर मुड़कर देखते जाते हैं। उनके घुँघराले बाल भी झूम-झूमकर श्यामसुन्दर का मुख चूमते हैं। उनका मोर मुकुट भी मतवाली चाल के कारण बार बार झुक-झुककर झूमता रहता है एवं उनके कुण्डल भी गाल को चूमते रहते हैं। उनकी गुंजमाला भी उनके गले में झूमती रहती है। उनकी बेसर भी मधुराधर का चुम्बन करती है। 'कृपालु' कहते हैं कि उनकी मुरली तो उनके मुख पर सब से अधिक झुकती, झूमती एवं मुख चूमती है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 398