# चलत झुकि झूमि झूमि नँदलाल।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0397-M09-K009
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्रीकृष्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 9
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 187–188

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>चलत झुकि झूमि झूमि नँदलाल।  
<a id="line-2"></a>इत उत लखत चपल चितवनि ते, घूमि घूमि गोपाल।  
<a id="line-3"></a>अलकनि झूमि झूमि मुख चूमति, घूमि घूमि घुँघराल।  
<a id="line-4"></a>पुनि पुनि मोर-मुकुट झुकि झूमत, चूमत कुंडल गाल।  
<a id="line-5"></a>झूमत गुंजमाल गल चूमति, बेसर अधर रसाल।  
<a id="line-6"></a>मुरलि “कृपालु” झूमि झुकि चूमत, सर्वाधिक मुख लाल॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हमारे श्यामसुन्दर झुक-झुककर झूमते हुए चलते हैं। वे अपने चंचल नेत्रों से इधर-उधर मुड़कर देखते जाते हैं। उनके घुँघराले बाल भी झूम-झूमकर श्यामसुन्दर का मुख चूमते हैं। उनका मोर मुकुट भी मतवाली चाल के कारण बार बार झुक-झुककर झूमता रहता है एवं उनके कुण्डल भी गाल को चूमते रहते हैं। उनकी गुंजमाला भी उनके गले में झूमती रहती है। उनकी बेसर भी मधुराधर का चुम्बन करती है। 'कृपालु' कहते हैं कि उनकी मुरली तो उनके मुख पर सब से अधिक झुकती, झूमती एवं मुख चूमती है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 398

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
