रसिया-माधुरी · पद 20
वारी-वारी जाऊँ वारी बनवारी पै।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: vārī-vārī jāūṁ, vārī banavārī pai
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1वारी-वारी जाऊँ वारी बनवारी पै।
2मोर-मुकुट की अटकनि, मटकनि, लटकनि लट अनियारी पै।
3नील-कपोलनि, अरु अनमोलनि, मृदु बोलनि अति प्यारी पै।
4चपल-दृगंचल-चितवनि पै अरु, जिन चितवति उन नारी पै।
5कनक-लकुटि की तनक झुकनि अरु, मुरि मुसकनि छवि न्यारी पै।
6कर कंकन, कटि किंकिनि धुनि, अरु, नूपुर धुनि झनकारी पै।
7मुरलि बजावनि अरु “कृपालु” गति, हंस-लजावनि-हारी पै॥
हिन्दी भावार्थ
मैं घनश्याम पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करता हूँ उनकी मोर-मुकुट को तिरछी अटकनि एवं मतवाली चाल के कारण उसके झूमने पर बलिहार जाता हूँ। उनकी घनी घुँघराली अलकों पर बलिहार जाता हूँ। उनके नीले गाल की शोभा एवं मधुर से भी मधुर रसभरी वाणी पर बलिहार जाता हूँ। उनके प्यार भरे परमात्मीयतायुक्त चंचल कटाक्ष एवं उन नारियों पर बलिहार जाता हूँ जिन्हें वे देखते हैं। उनकी स्वर्ण की लठिया को थोड़ी झुकनि एवं घूमकर मधुर मुस्काने पर बलिहार जाता हूँ। उनके हाथ के कंकण, कमर की किंकिणी एवं चरण के नूपुर की मधुर झंकार पर बलिहार जाता हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि मैं तो विशेषतः उनकी मधुर मुरली ध्वनि एवं हंस को लज्जित करने वाली मतवाली चाल पर बलिहार जाता हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 912