# वारी-वारी जाऊँ वारी बनवारी पै।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0985-M20-K020
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: रसिया-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 20
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 463–463

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>वारी-वारी जाऊँ वारी बनवारी पै।  
<a id="line-2"></a>मोर-मुकुट की अटकनि, मटकनि, लटकनि लट अनियारी पै।  
<a id="line-3"></a>नील-कपोलनि, अरु अनमोलनि, मृदु बोलनि अति प्यारी पै।  
<a id="line-4"></a>चपल-दृगंचल-चितवनि पै अरु, जिन चितवति उन नारी पै।  
<a id="line-5"></a>कनक-लकुटि की तनक झुकनि अरु, मुरि मुसकनि छवि न्यारी पै।  
<a id="line-6"></a>कर कंकन, कटि किंकिनि धुनि, अरु, नूपुर धुनि झनकारी पै।  
<a id="line-7"></a>मुरलि बजावनि अरु “कृपालु” गति, हंस-लजावनि-हारी पै॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

मैं घनश्याम पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करता हूँ उनकी मोर-मुकुट को तिरछी अटकनि एवं मतवाली चाल के कारण उसके झूमने पर बलिहार जाता हूँ। उनकी घनी घुँघराली अलकों पर बलिहार जाता हूँ। उनके नीले गाल की शोभा एवं मधुर से भी मधुर रसभरी वाणी पर बलिहार जाता हूँ। उनके प्यार भरे परमात्मीयतायुक्त चंचल कटाक्ष एवं उन नारियों पर बलिहार जाता हूँ जिन्हें वे देखते हैं। उनकी स्वर्ण की लठिया को थोड़ी झुकनि एवं घूमकर मधुर मुस्काने पर बलिहार जाता हूँ। उनके हाथ के कंकण, कमर की किंकिणी एवं चरण के नूपुर की मधुर झंकार पर बलिहार जाता हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि मैं तो विशेषतः उनकी मधुर मुरली ध्वनि एवं हंस को लज्जित करने वाली मतवाली चाल पर बलिहार जाता हूँ।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 912

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
