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RADHEY RADHEY

रसिया-माधुरी · पद 19

वारी-वारी छवि, वारी नथवारी की।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: vārī-vārī chhavi, vārī nathavārī kī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1वारी-वारी छवि, वारी नथवारी की।

2लखि श्रृंगार लजत श्रृंगारहुँ, छवि-छवि छवि अस प्यारी की।

3मणिन-अलंकृत कनक मुकुट पर, लर-मुक्त न मनहारी की।

4घूँघर-वारी अति अनियारी, छवि प्यारी लट कारी की।

5अम्बर नील गौर-तनु छवि जनु, घन दामिनि अनुहारी की।

6झुकि झूमति नासा नथ-बेसर, मुख चूमनि छवि न्यारी की।

7कर मेहँदी, पग रची मिहावरि, सिर सेंदुर अरुणारी की।

8कनकन कंकन किंकिनि नूपुर, धुनि चूरिन झनकारी की।

9छिनहिं मान, मुसकान छिनहिं पुनि, छवि बरसाने-वारी की।

10कह “कृपालु” इक चितवनि महँ गति, लखत बनत बनवारी की॥

हिन्दी भावार्थ

नथवारी वृषभानुदुलारी की उस मनोहारी छवि पर मैं वारी-वारी जाता हूँ। किशोरी जी के शृंगार को देखकर साक्षात् शृंगार भी लज्जित होता है एवं किशोरी जी की छवि को देखकर साक्षात् छवि भी लज्जित होती है। मणि-मण्डित स्वर्ण के मुकुट पर मोतियों की लड़ों का शृंगार नितांत मनोहारी है। किशोरी जी की घुँघराली, काली एवं घनी लटें अत्यन्त ही प्यारी हैं। किशोरी जी के गौर शरीर पर नीलाम्बर ऐसा सुशोभित है मानो बादल एवं बिजली का संयोग हो रहा हो! नासिका में पहनी हुई नथ एवं बेसर झुक-झुककर झूमती हुई बार-बार मुख चूम रही है। हाथ में लाल मेहुँदी, पैर में लाल मिहावर एवं सिर पर लाल सिन्दूर की छवि तो देखते ही बनती है। सुवर्ण के कंकण, सुवर्ण की किंकिणी, सुवर्ण के नूपुर एवं चूड़ियों की झनकार बरबस मन को मुग्ध कर लेती है। बरसाने वाली की वह छवि सर्वथा अनुपमेय है, जब वह एक क्षण में तो मान कर लेती हैं तथा दूसरे ही क्षण मुस्करा देती हैं। कृपालु' कहते हैं मुझे तो सबसे बढ़िया छवि श्यामसुन्दर की तब लगती है जब किशोरी जी एक बार घूमकर उन पर कटाक्षपात कर देती हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 910-911